April 21, 2019

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उत्तर प्रदेश के प्रमुख दर्शनीय स्थल मथुरा, काशी, अयोध्या

उत्तर प्रदेश के प्रमुख तीर्थ स्थल: प्रयाग, अयोध्या, सारनाथ, मथुरा, नैमिषारण्य

विश्व प्रसिद्ध ताजमहल, बुद्ध का महापरिनिर्वाण स्थल उत्तर प्रदेश में है

Buddhadarshan News, Lucknow

उत्तर प्रदेश जनसंख्या के मद्देनजर भारत का सबसे बड़ा राज्य है। यह प्रदेश दुनिया के सर्वाधिक उपजाऊ भू-भाग में से एक है। यह प्रदेश गंगा, यमुना, सरयू और गोमती इत्यादि नदियों के बीच स्थित है। पर्यटन के मद्देनजर यह प्रदेश काफी संपन्न है। यहां पर विश्व प्रसिद्ध ताज महल स्थित है। भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या, वाराणसी, मथुरा, सारनाथ, भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण जैसे महत्वपूर्ण स्थल हैं।

प्रयागराज के पर्यटन स्थल

प्रयागराज:

यह एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यहां हर बारहवें वर्ष में कुम्भ और हर छठे वर्ष में अर्द्ध कुम्भ मेला का आयोजन होता है। भारद्वाज मुनि का आश्रम और प्राचीन अक्षयवट यहीं है। गंगा, यमुना और सरस्वती (विलुप्त) के संगम पर स्थित प्रयागराज को ‘तीर्थराज’ के नाम से प्रसिद्ध है।

अयोध्या के दर्शनीय स्थल

अयोध्या:

यह नगरी भगवान श्री राम की जन्मस्थली है। इस नगरी में श्रीराम, सीता और दशरथ से संबंधित अनेक स्थान हैं।

कैसे जाएं वाराणसी

वाराणसी:

दुनिया की सबसे प्राचीन नगरी के तौर पर इस शहर को जाना जाता है। यहां पर भगवान शिव का विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर है। यहां पर कई प्रसिद्ध मंदिर है। गंगा के किनारे स्थित इस शहर के घाट बहुत ही मनोरम हैं। यहां पर अस्सी, तुलसी, मणिकर्णिका घाट, अहिल्याबाई, दशाश्वमेध और हरिश्चंद्र घाट प्रसिद्ध हैं।

Sarnath: बुद्ध ने यहीं दिया था पहला उपदेश

सारनाथ:

वाराणसी से लगभग 13 किमी दूर सारनाथ स्थित है। भगवान बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश यहीं पर दिया था। यहां पर धमेख स्तूप के अलावा देश का राष्ट्रीय चिन्ह भी इसी स्थान से लिया गया है। यहां का संग्रहालय भी काफी प्रसिद्ध है।

श्रावस्ती:

उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में नेपाल की सीमा पर बहराइच मुख्यालय से 50 किमी दूर श्रावस्ती स्थित है। बौद्ध धर्म और जैन धर्म का यह प्रमुख केंद्र रहा है। भगवान बुद्ध ने इस नगर में कई बार उपदेश दिया।

कुशीनगर:

गोरखपुर मुख्यालय से लगभग 55 किमी दूर कुशीनगर स्थित है। भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण यहीं पर हुआ था। यहां सबसे अधिक उल्लेखनीय मूर्ति भगवान बुद्ध की लेटी हुई विशाल प्रतिमा है। यहां पर जापान, श्रीलंका, थाईलैंड सहित कई देशों ने बुद्ध का मंदिर भी बनवाया है। यहां पर भगवान बुद्ध की 500 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जाएगी।

संकिसा:

बौद्ध अनुयायियों के अनुसार फरूर्खाबाद स्थित संकिसा में भगवान बुद्ध देवलोक से पृथ्वी पर यहां अवतरित हुए थे। यह स्थान हिन्दुओं के लिए भी पवित्र है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा वृतांत में संकिसा का वर्णन किया है।

कन्नौज:

प्राचीन काल में यह शहर काफी वैभवपूर्ण था। इसका प्राचीन नाम कान्यकुब्ज था। सम्राट हर्षवर्धन की यह राजधानी रही है। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार यहां पर यहां पर 10 हजार भिक्षु रहते थे। यह नगर छठी ई.पू. से बारहवीं शताब्दी तक भारत की राजधानी रहा। इत्र के लिए मशहूर इस शहर में हजारों वर्ष पुराने खण्डहर, मंदिर और मस्जिद पर्यटकों के लिए आकर्षण के केंद्र हैं।

देवबंद:

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरपुर से 24 किमी दूर यह स्थान स्थित है। यहां दुर्गाजी का मंदिर एवं एक सरोवर भी है। इसके अलावा यहां पर दारूल उलूम देवबंद विश्वविद्यालय भी है।

शाकम्भरी देवी:

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिला मुख्यालय से 41 किमी दूर यह मंदिर स्थित है। यह मंदिर चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा है।

हस्तिनापुर:

यह नगरी मेरठ से 35 किमी दूर है। यहां पाण्डवों की राजधानी थी। यह जैन तीर्थ स्थल भी है। इसे ‘दानतीर्थ’ भी कहा जाता है। यहां भसूमा गांव में प्राचीन जैन प्रतिमाएं हैं।

गढ़मुक्तेश्वर:

दिल्ली से पूर्व दिशा में लगभग 139 किमी दूर गंगा नदी के किनारे यह स्थान स्थित है। यहां भगवान शिव का एक मंदिर भी है। कार्तिक पूर्णिमा को यहां मेला लगता है।

सोरों:

दिल्ली के लगभी 300 किमी दूर उत्तर प्रदेश के एटा जनपद में सोरों या शूकर क्षेत्र स्थित है। यहां पर वराह भगवान का एक अति प्राचीन मंदिर है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सर्वप्रथम पृथ्वी का आविर्भाव यहीं हुआ था।  

कालपी:

बुंदेलखण्ड के जालौन जिला में व्यास टीला और नृसिंह टीला स्थित है। माना जाता है कि प्रहलाद की रक्षा के लिए भगवान नृसिंह यहीं पर प्रकट हुए थे।

श्रृंगवेरपुर:

प्रयागराज से 48 किमी दूर राम चौरा रोड स्टेशन से 3 किमी दूर यह स्थान स्थित है। वन जाते समय भगवान श्रीराम ने निषादराज के आग्रह पर यहीं पर रात्रि विश्राम किया था।

कौशांबी:

यहां बौद्धों और जैनों का प्रसिद्ध तीर्थ है। यहां खुदाई में अनेक प्राचीन मूर्तियां प्राप्त हुई हैं।

चुनार:

यहां के दुर्ग में आदि विक्रमादित्य द्वारा निर्मित भर्तृहरि का मंदिर है। पास में बल्लभ सम्प्रदाय का कूप मंदिर है।

विंध्याचल:

यहां मां विंध्वासिनी देवी का प्रसिद्ध मंदिर है।

लोधेश्वर:

बाराबंकी जिला में भगवान लोधेश्वर का मंदिर है।

देवीपाटन:

यहां पाटेश्वरी देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां प्रतिवर्ष मेला लगता है।

मगहर:

संत कबीरदास जी ने यहीं पर शरीर त्याग किया था। यहां पर संत कबीर की समाधि और मजार, हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में यहीं स्थित हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के आखिरी छोर पर है महर्षि भृगु की तपोभूमि ‘बलिया’

भृगु मंदिर:

पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद मुख्यालय से 1 किमी दूर महर्षि भृगु का यह मंदिर स्थित है। यहां पर महर्षि भृगु के शिष्य दरदर मुनि का भी मंदिर है। यहां प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर विश्व प्रसिद्ध मेला लगता है।

देवगढ़:

बुंदेलखण्ड के ललितपुर स्टेशन से लगभग 37 किमी पश्चिम में स्थित है। यहां दशावतार मंदिर प्रसिद्ध है।

मथुरा:

भगवान श्रीकृष्ण की यह जन्मस्थली है। मथुरा में द्वारिकाधीश मंदिर और विश्राम घाट, जन्मभूमि के दर्शन के लिए यहां पर प्रतिवर्ष लाखों यात्री आते हैं।

वृंदावन:

मथुरा से लगभग 10 किमी दूर वृंदावन स्थित है। कहा जाता है कि यहां पर लगभग 4 हजार मंदिर, घाट और सरोवर हैं। यहां पर गोविंद देव मंदिर, रंगनाथ मंदिर, बिहारी जी का मंदिर, राधाबल्लभ मंदिर, राधारमण मंदिर, गोपीनाथ का मंदिर, शाहजी का मंदिर इत्यादि प्रसिद्ध हैं। इसके अलावा यहां पर निधिवन और सेवाकुंज प्रसिद्ध वन स्थलियां हैं। कालीदह, केशघाट, वंशीघाट यमुना के प्रसिद्ध घाट हैं।

नंदगांव:

मथुरा से 48 किमी उत्तर-पूर्व में एक पहाड़ी की तलहटी में नंदगांव स्थित है।

गोवर्धन:

यह मथुरा से 23 किमी दूर भरतपुर जाने वाली सड़क पर स्थित है। यहां हरिदेव का मनोहर मंदिर है।

बरसाना:

मथुरा में गोवर्धन से 24 किमी उत्तर में बरसाना स्थित है। इसे भगवान कृष्ण की प्रेयसी राधाजी का जन्मस्थान माना जाता है। यहां प्रतिवर्ष राधाष्टमी के अवसर पर मेला लगता है।

मथुरा से 21 किमी दूर दाऊजी में भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ जी का मंदिर स्थित है।

कानपुर:

कानपुर शहर से लगभग 24 किमी उत्तर- पश्चिम में गंगा किनारे बसा यह नगर ऐतिहासिक और धार्मिक, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यहीं रामायण के रचयिता महर्षि बाल्मीकि का आश्रम बताया जाता है।

भीतरगांव:

कानपुर जिले की नरवल तहसील में कानपुर से लगभग 32 किमी दक्षिण में स्थित है। यहां ईंट का बना गुप्तकालीन एक महत्वपूर्ण मंदिर है।

चित्रकूट:

बुंदेलखंड में बांदा से 80 किमी दूर चित्रकूट स्थित है। यहां मंदाकिनी नदी बहती है। वन जाते समय भगवान श्रीराम यहां ठहरे थे। इसी नदी के तट पर कामतानाथ से लगभग 2.4 किमी पर सीतापुर स्थित है। यहां पर नदी के किनारे 24 घाट हैं।

यहां से लगभग 3 किमी दूर सती अनुसूया और महर्षि अत्रि का आश्रम है। मंदराचल पर्वत पर अनुसूया, अत्रि, दत्तत्रेय और हनुमान जी का मंदिर है। यहीं पर जानकी कुण्ड है।

राजापुर:

बांदा से 99.2 किमी और चित्रकूट से 38.4 किमी की दूरी पर राजापुर स्थित है। माना जाता है कि महाकवि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म यहीं हुआ था।

आगरा:

मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में विश्व प्रसिद्ध ताजमहल का निर्माण इसी शहर में यमुना नदी किनारे किया गया। यहां पर आगरा का किला भी है। इसके अलावा 40 किमी दूर फतेहपुर सीकरी में बादशाह अकबर ने महल का निर्माण कराया। प्रसिद्ध सूफी संत शेख सलीम चिश्ती की दरगाह भी यहीं है। आगरा के पास सिकंदरा में अकबर का मकबरा और एतमादुदौला का मकबरा है।

लखनऊ:

कहा जाता है कि भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण ने इस शहर को बसाया था। इसका प्राचीन नाम लक्ष्मणपुर था। नवाबों के इस प्रसिद्ध शहर में रूमी दरवाजा, इमामबाड़ा, आसफी मस्जिद, दौलतखाना, रेजीडेंसी, बिबियापुर कोठी इत्यादि निर्मित हैं। इसके अलावा यहां पर शहीद स्मारक, चिड़ियाघर और नेशनल बॉटेनिकल गार्डन भी दर्शनीय हैं। यहां प्रसिद्ध शाहमीना की मजार है।

जौनपुर:

वाराणसी से लगभग 68 किमी दूर इस शहर को फिरोजशाह तुगलक ने अपने भाई जूना खां की याद में बसाया। यहां अटाला मस्जिद, लाल दरवाजा मस्जिद और जामा मस्जिद के अलावा किला दर्शनीय हैं।

देवा शरीफ:

लखनऊ से 25 किमी और बाराबंकी जनपद से 12 किमी दूर देवा में प्रसिद्ध सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार है। यहां पर देश-विदेश से भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता की एक मिसाल के तौर पर भी जाना जाता है।

बांसा:

बाराबंकी से लगभग 16 किमी दूर स्थित बांसा, मुसलमानों के लिए सुप्रसिद्ध सूफी संत सैयद शाह अब्दुल रज्जाक की दरगाह स्थित है।

बहराइच:

यहां सैयद सालार मसूद गाजी की दरगाह है। सैयद सालार भारत पर आक्रमण करने वाले महमूद गजनवी के साथ भारत आए थे।

गोला गोकर्णनाथ:

लखीमपुर खीरी से 35 किमी दूर यह स्थान स्थित है। कहा जाता है कि भगवान शिव को लेकर जाते समय रावण ने इसी स्थान पर भगवान शिव को एक भक्त को कुछ देर के लिए दिया, लेकिन भक्त ने शिवलिंग को वहीं पर रख दिया, जिसे बाद में रावण ने गुस्से में शिवलिंग को अंगूठे से दबा कर चला गया।

कम्पिल:

फरूर्खाबाद के कम्पिल में महासती द्रौपदी और गुरू द्रोणाचार्य की जन्मस्थली है। यह जैन धर्म के प्रवर्तक तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ का भी जन्मस्थान है। द्रौपदी का स्वयंवर भी यहीं हुआ था।  

श्रृंगीरामपुर:

फर्रुखाबाद जिला में गंगा नदी के किनारे श्रृंगी ऋषि का मंदिर है। कार्तिक पूर्णिमा और दशहरा में यहां मेला लगता है।

नैमिषारण्य:

लखनऊ के पड़ोसी जिला सीतापुर स्थित नैमिषारण्य आध्यात्मिक विकास का केंद्र रहा है। यह 88 हजार ऋषियों की तपस्थली रही है। कहा जाता है कि वृत्रासुर नामक राक्षस के वध के लिए महर्षि दधीचि ने अपने शरीर का त्याग किया था और उनकी हडिडयों से धनुष बनायी गई थी।

मिश्रिख:

नैमिषारण्य से 10 किमी दूरी पर मिश्रिख स्थित है। कहा जाता है कि अपनी अस्थी दान से पूर्व महर्षि दधीचि ने समस्त तीर्थों के जल से स्नान किया था।

गोरखनाथ मंदिर:

महायोगी गुरू गोरखनाथ ने यहां पर खिचड़ी का प्रसाद बांटा था और चमत्कार दिखाया था। यहां गुरू गोरखनाथ का मंदिर स्थित है।

शुक्रताल:

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फपुर में यहां वट वृक्ष के नीचे बैठकर महर्षि शुक्रचार्य ने राजा परीक्षित को महाभारत की कथा सुनाई थी।

भरत कुण्ड:

फैजाबाद से 25 किमी दूर नन्दिग्राम के नाम से यह स्थान प्रसिद्ध है। यहां पर भरत जी ने श्री रामचंद्र जी के वनवास की अवधि में 14 साल तक तपस्या की थी।

किछौछा:

अयोध्या जनपद में यहां मुस्लिम संत सैय्यद महमूद शाह अशरफ जहांगीर की दरगाह है।

बांगरमऊ:

यह उन्नाव का छोटा सा कस्बा है। यहां जगदम्बा की एक बड़ी सुंदर प्रतिमा है, जो अष्टधातुओं से निर्मित है। मंदिर कुण्डलिनी-योग विचारधारा पर आधारित है।

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