March 18, 2019

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अनुप्रिया पटेल के सड़क से संसद तक के संघर्ष से ओबीसी आयोग को मिला संवैधानिक दर्जा

पिता डॉ.सोनेलाल पटेल की असामयिक मौत के बाद अनुप्रिया पटेल ने किया संघर्ष

-अब ओबीसी आयोग काे अपना विशेषाधिकार होगा, ओबीसी से संबंधित मामलों की सुनवाई करेगा

Buddhadarshan News, Lucknow

एक बेटी जिसने वर्ष 2009 में पिता की असामयिक निधन पर प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर राजनीति में आई और पिछड़ों, वंचितों, दलितों के अधिकारों के लिए सड़क से लेकर संसद तक संघर्ष की। पिछले नौ सालों की कड़ी मेहनत की वजह से आज इस बेटी की मेहनत रंग लाना शुरू कर दी है। यह बेटी कोई और नहीं बल्कि यश:कायी डॉ.सोनेलाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल है। आज अनुप्रिया पटेल की मेहनत का ही नतीजा है कि केंद्र की मोदी सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलाने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी दिलाई है।

सड़क से संसद तक उठी आवाज:

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने 2009 में राजनीति में आने के बाद से ही लगातार पार्टी के प्रत्येक कार्यक्रमों में ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलाने की मांग करती रही हैं। वर्ष 2012 में विधायक बनने के बाद अनुप्रिया पटेल ने इस आवाज को सड़क से लेकर विधानसभा की गलियारों में भी उठाना शुरू कर दिया। वर्ष 2014 में मिर्जापुर से सांसद बनने के बाद उन्होंने इस मांग की आवाज पुरजोर ढंग से संसद के पटल पर उठायीं। अनुप्रिया पटेल ने इस मांग को इतनी मजबूती से उठाया कि केंद्र सरकार को इस मामले की गंभीरता को समझते हुए विचार करने पर विवश हो गई। इसके अलावा उन्होंने नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए) की बैठक में भी इस मुद्दे को उठाया। परिणामस्वरूप मोदी सरकार ने इस प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में रखा, जहां से इस विधेयक को मंजूरी मिल गई। इस बाबत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में संविधान में 123वां संशोधन को संसद से मंजूरी दी गई।  

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ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलने के लाभ:

आयोग को अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी। आयोग को संविधान के अधीन सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए उपबंधित सुरक्षा उपाय से संबंधी मामलों की जांच और निगरानी करने का अधिकार होगा। इसके अलावा आयोग पिछड़े वर्गों के सामाजिक और आर्थिक विकास में भाग लेगा और सलाह देगा। साथ ही राज्य अपने लिए ओबीसी जातियों का निर्णय करने के बारे में स्वतंत्र हैं। इस विधेयक के कानून बनने के बाद यदि राज्य किसी जाति को ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल करना चाहते हैं तो वे सीधे केंद्र  या आयोग को भेज सकते हैं। आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होंगे।

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-यह आयोग पिछड़े वर्गों से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगा। पिछड़ी जातियों की शिकायतों का निपटारा करने में आसानी होगी। अब ओबीसी तबके में जातियों को जोड़ने और घटाने के लिए राज्यपाल से परामर्श लेने का प्रस्ताव हटा। अब राज्य सरकारों से ही परामर्श लेने का प्रावधान है। इस आयोग का गठन 1993 में हुआ था।

-ओबीसी के उत्थान के लिए बनने वाली योजनाओं में आयोग अब सलाहकार के बजाय भागीदार होगा और पिछड़ों के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में भाग लेगा।

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