April 21, 2018

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अंतिम दौर में है बलिया का ऐतिहासिक ‘सोनाडीह मेला’

Ashok Jaiswal , New Delhi/Ballia

पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के बेल्थरा रोड क्षेत्र में 25 मार्च रामनवमी के दिन से लगने वाला ऐतिहासिक ‘सोनाडीह मेला’ अब अंतिम चरण में है। चैत्र रामनवमी से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक चलने वाले इस मेले में बलिया जनपद के अलावा मऊ, देवरिया सहित विभिन्न जिलों से काफी संख्या श्रद्धालु आते हैं। इस मेले का पौराणिक महत्व है। मान्यता है कि जब क्षेत्र में राक्षसों का आतंक बढ़ गया तो मां चामुण्डा ने इनका संहार करने के बाद इसी स्थान पर विश्राम की थी। यह स्थान विजय स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है।

मन्नत मांगने दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु:

ऐसी मान्यता है कि संसारिक कष्टों से पीड़ित मनुष्य जब यहां मां भागेश्वरी व परमेश्वरी का दर्शन पूजन करता है तो उन्हें इसका लाभ अवश्य मिलता है। श्रद्धालुओं के संसारिक कष्टों से मुक्ति पाने व मन्नतें मागने के लिए यहां अधिकाधिक संख्या में पहुंचने से यहां मेला का माहौल बन गया जो कालान्तर में एक वृहद मेले के रूप में परिवर्तित हो गया। मान्यता है कि शक्तिपीठ में शुमार सोनाडीह Sonadih Temple मंदिर में पूजा-अर्चना करने वालों की सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।

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वैसे तो सोनाडीह बलिया के अंतिम छोर पर स्थित है। लेकिन यहां से मऊ और देवरिया जनपद की सीमा चंद किलोमीटर की दूरी पर शुरू हो जाती है।

सोनाडीह का इतिहास

मान्यता है कि  क्षेत्र में रक्तबीज राक्षस व उनके दूत हाहा व हूहू  का काफी आतंक था। इस दौरान हाहा व हूहू राक्षसों ने मां चामुण्डा से शादी का प्रस्ताव रखा। मां चामुण्डा ने उनके प्रस्ताव पर सूर्योदय तक घाघरा नदी के बहाव को मोड़कर सोनाडीह तक ले आने की शर्त रखी। शर्त को पूरा करने के लिए दोनों राक्षस रात भर घाघरा नदी की खुदाई करते रहे। परन्तु सूर्योदय तक उनका कार्य पूरा नहीं हो सका। हार से खीजकर दोनो राक्षसों ने मां को युद्ध के लिए ललकारा। मां चामुण्डा ने युद्ध के दौरान उनका संहार कर दिया। मंदिर के उत्तर दिशा में आधा किमी दूर हाहा नाला को इसी से जोड़ कर देखा जाता है। उधर अपने दूतों के बध की खबर सुनते ही रक्तबीज आग बबूला हो गया तथा मां से बदला लेने पहुंच गया। मां चामुण्डा ने युद्ध के दौरान उसका भी वध कर दिया। गांव के दक्षिण-पश्चिम में मौजूद रतोई ताल को रक्तबीज से ही जुड़ा बताया जाता है। इसी प्रकार मंदिर के उत्तर दिशा में मौजूद मटूकाडीह गांव के बारे में किवदंती है कि मधु-कैटभ नामक राक्षस का वध मां ने इसी स्थान पर किया था। मंदिर के पूर्व दिशा से 2 किमी दूर स्थित चंद्रौल गांव को भी चामुण्डा असुर के संहार से जोड़ कर देखा जाता है वहीं गांव के दक्षिण तरफ मौजूद शुम्भा ताल मां द्वारा शुम्भ-निशुम्भ राक्षसों के वध की गवाही देता है।

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जाने का रास्ता:

सोनाडीह मेला स्थल से लगभग 8 किलोमीटर दूर सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन बेल्थरा रोड है। यह वाराणसी-गोरखपुर रेलमार्ग पर घाघरा नदी से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां उतरकर आप ऑटो अथवा बस या टैक्सी से सोनाडीह मेला स्थल पर जा सकते हैं। बेल्थरा रोड में बस डिपो भी है, जहां से यूपी के प्रमुख महानगरों और दिल्ली तक के लिए परिवहन सुविधा उपलब्ध है।

फसल कटाई के बाद आयोजित मेले में किसानों की भीड़:

चूंकि यह मेला रामनवमी से शुरू होता है। आम तौर पर इस समय तक किसान अपनी फसल काफी हद तक काट लिए होते हैं। ऐसे में फसल कटाई के बाद क्षेत्र के किसान यहां पर जरूर आते हैं।

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