February 16, 2019

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1857 की क्रांति: आजमगढ़ में अंग्रेजों ने जहरीली गैसे से किया था हमला

Buddhadarshan News, New Delhi

अंग्रेजों ने 1857 में आजमगढ़ में किया था ‘केमिकल अटैक’

रात के अंधेरे में हिन्दुस्तानी सेना पर छोड़ी गई तेज खांसी वाली गैस

1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने विद्रोह को दबाने के लिए केमिकल अटैक का सहारा लिया था। आजमगढ़ की लड़ाई में बार-बार शिकस्त खाने के बाद अंग्रेज कलेक्टर बने बुल्स ने भारतीय फौज पर रात के अंधेरे में केमिकल अटैक (तेज खांसी फैलाने वाली गैस) किया था, जिसकी वजह से भारतीय फौज में भगदड़ मच गई थी और इसका फायदा उठाकर अंग्रेजों ने गाजर-मूली की तरह  क्रांतिकारी सेना का सफाया किया था। इसका खुलासा लेखक रोशन लाल पटेल ने अपनी नई पुस्तक ‘राजा जयलाल सिंह’ में की है।

अवध की सेना के सेनापति  राजा जयलाल सिंह ने अपने छोटे भाई एवं अतरौलिया रियासत (आजमगढ़ शहर से 40किमी उत्तर-पश्चिम) के कुर्मी राजा बेनी माधव सिंह के पास बगावत का संदेश भेजा। तत्पश्चात राजा बेनी माधव सिंह ने अपने सूत्रों के जरिए आजमगढ़ स्थित हिन्दुस्तानी पलटन संख्या 17 में बगावत करने की रणनीति बनाई।

इधर, राजा बेनी माधव सिंह ने मित्र मधई सिंह यादव को अहिरीपुर गांव से बुलाया, वे लखनऊ में भी राजा जयलाल सिंह के साथ थें और तोपों के अचूक निशानेबाज थें। पूर्व योजना के अनुसार 3 जून को आजमगढ़ में सबेरे ही एक साथ सिपाहियों में क्रांति का विस्फोट हुआ। फतेह बहादुर सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारी सेना ने खजाने के 5 लाख रुपए लूट लिए। इस समय आजमगढ़ में 500 अंग्रेज सिपाही थें। जो अंग्रेज जहां मिला, उसे वहीं मार दिया गया। जेल तोड़कर कैदियों को सिपाहियों ने अपने साथ मिला लिया। लेफ्टिनेंट हचिसन मारा गया। आजमगढ़ स्वतंत्र घोषित कर दिया गया। वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक में 3 जून को आजमगढ़ के युद्ध का बड़ा ही रोचक वर्णन किया है।

इसके बाद फतेह बहादुर सिंह अतरौलिया चले गए। उधर, फतेह बहादुर सिंह के वापस जाते ही अपने भागे हुए सैनिकों को इकट्‌ठा कर व गोरखा पलटन को साथ लेकर कलेक्टर बने बुलस ने आजमगढ़ पर पुन: अधिकार कर लिया।

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अंग्रेजों को ज्ञात हुआ कि 3 जून की योजना बनाने वाले अतरौलिया के राजा लोग है, उसने तत्काल अतरौलिया को सबक सिखाने की योजना बनायी। लेकिन पहले से अतरौलिया की सेना तैयार थी। बेनी माधव सिंह ने मधई प्रसाद को तोपे दागने का हुक्म दे दिया। मधई सिंह की तोपे आग उगलने लगी। अंग्रेजी सेना में भगदड़ मच गई, बेने बुल्स आजमगढ़ की ओर भागा।

अतरौलिया पर दूसरा आक्रमण:

अंग्रेजों को पूरी तरह से नष्ट करने के लिए बेनी माधव सिंह ने अपने मित्र जगदीश पुर के राजा कुंअर सिंह और पलवार के राजपूत साथी पृथ्वीपाल सिंह को बुलाने के लिए संदेश भेजा। इधर, बेने बुल्स ने अतरौलिया पर दुबारा हमला किया, लेकिन उसे फिर से हार का स्वाद चखना पड़ा। वेने बुल्स ने तीसरी बार फिर हमले की योजना बनाई। लेकिन दो दिन बाद पृथ्वीपाल सिंह अपनी सेना लेकर आ गए। राजा बेनी माधो सिंह की फौज के सेनापति भीलमपुर के ठाकुर हरनाम सिंह थे। दोनों राजाओं की मिलीजुली सेना ने अंग्रेजी सेना की ऐसी मार मचायी कि कोयलसा का जंगल रक्त रंजित हो गया। बेने बुल्स रात के अंधेरे में जंगलों का लाभ उठाकर भाग गया। राजा बेनी माधव सिंह ने पृथ्वीपाल सिंह से आजमगढ़ जाकर कब्जा करने को कहकर अपनी सेना को भी हरनाम सिंह के नेतृत्व में आजमगढ़ भेज दिए और खुद छोटे भाई फतेह बहादुर सिंह के साथ वापस अतरौलिया चले गए। हिन्दुस्तानी सेना आजमगढ़ पर दोबारा कब्जा कर ली। बेने बुल्स गाजीपुर भाग गया। पृथ्वीपाल सिंह ने स्वतंत्र रूप से एक माह तक आजमगढ़ पर शासन किया।

अंग्रेजों ने किया केमिकल अटैक:

इस बार बेने बुल्स ने आजमगढ़ पर हमले की दूसरी रणनीति बनाई। उसने अपने तोपों में कोई जहरीला पदार्थ भरकर राजा साहब की सेना पर फेंका। सारी सेना में भयंकर खांसी फैल गई।

राजा बेनी माधव सिंह को जब यह जानकारी मिली तो अपनी शेष सेना को लेकर अतरौलिया से आजमगढ़ पर हमला के लिए चल दिए।

आजमगढ़ के पास मदुरी के बाग में पृथ्वीपाल सिंह भी उन्हें मिल गए। दोनों ने प्रात: हमले की तैयारी कर सभी लोग सो गए। उधर, वेने बुल्स को यह जानकारी मिली तो उसने रात के अंधेरे में ही मदुरी बाग में इकट्‌ठी राजा की सेना पर खांसी फैलाने वाली गैस झोंक दी। वुल्स ने पीछे के रास्ते से चुने हुए सिपाहियों को तोपचियों पर हमला करने भेज दिए। अधिकांश तोपची मारे गए। गोरखा फौज ने तोपची मधई प्रसाद को भी मार दिया। सारी सेना गाजर-मूली की तरह से काट दी गई। घायल राजा बेनी माधोसिंह और फतेह बहादुर सिंह बचे सैनिकों के साथ अतरौलिया हेतु हुए फैजाबाद से लखनऊ अपने बड़े भाई राजा जयलाल सिंह के पास चले गए और आजमगढ़ की पूरी घटना बताई।

अतरौलिया जलकर राख हुई:

उधर, वेने बुल्स मारकाट करता हुआ अतरौलिया पहुंचा। अतरौलिया को जमकर लूटा गया और फिर आग लगा दी गई। किला को जमींदोज कर दिया गया।

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बाबू कुंअर सिंह का आजमगढ़ पर हमला:

राजा बेनी माधौ सिंह का संदेश पाकर बाबू कुंअर सिंह ने आजमगढ़ की ओर रूख किया। लेकिन अंग्रेज सजग हो गए। कुंअर सिंह ने पलवार के राजपूतों से सहयोग मांगा, लेकिन वे तैयार नहीं हुए। तो 80 वर्षीय बाबू कुंअर सिंह अकेले ही अंग्रेजों से लोहा लिया। उधर, अंग्रेज जनरल डगलस भी आजमगढ़ आ गया। लगातार लड़ते-लड़ते कुंअर सिंह की सेना थक गई। एक बार तो कुंअर सिंह ने अंग्रेजों को खदेड़ दिया, लेकिन अंग्रेज फिर से हावी हो गए। बाबू कुंअर सिंह बची खुची सेना के साथ बलिया होते हुए गंगा पार कर जगदीश पुर की राह पकड़ी।

अतरौलिया रियासत, एक नजर:

उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ से उत्तर पश्चिम दिशा में फैजाबाद रोड पर 40 किलोमीटर दूर अतरौलिया नाम का कस्बा है। इसके आसपास कुर्मियों के 52 गांव बसे हुए हैं। यहां कुर्मियों की सन्कत्ता शाखा के गरीबदास नाम के सत्पुरूष रहते थे। गांव में इनका बड़ा मान-सम्मान था।

सन् 1782 में इनको एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम दर्शन सिंह रखख गया। माता-पिता ने दर्शन सिंह की शिक्षा-दीक्षा, पालन पोषण बड़े लाड़ प्यार से किया। युवा होने पर दर्शन सिंह काम की तलाश में लखनऊ आए। लखनऊ आकर दर्शन सिंह अवध की सेना में शामिल हो गए। दर्शन सिंह ने पूरी लगन, ईमानदारी व वफादारी के साथ ट्रेनिंग ली। बहुत जल्दी ही वे युद्ध विद्या में पारंगत हो गए।

विलक्षण प्रतिभा के धनी दर्शन सिंह जीवन की ऊंचाईयों को जल्दी-जल्दी चढ़ते चले गए, वे नवाब की सेवा में लगे रहे और जल्दी ही उनके विश्वास पात्र हो गए। जल्दी ही उन्हें सेना का सिपहसलार बना दिया गया।

दर्शन सिंह की योग्यता से प्रसन्न होकर अवध के नवाब ने उन्हें ‘राजा’ की उपाधि दी और बहुत सारी जायदाद बख्शी।

राजा दर्शन सिंह की तीन रानियां थीं। बड़ी रानी से एक पुत्री, मझली रानी के दो पुत्र रघुवर दयाल सिंह व फतेह बहादुर सिंह और छोटी रानी सुभागी के पुत्र जयलाल सिंह और बेनी माधव सिंह थे।

नवाब वाजिद अली शाह ने भी राजा दर्शन् सिंह को फैजाबाद, आजमगढ़ व सुल्तानपुर के कई गांवों का इलाका प्रदान किया और 101 पार्चों की खिलियत प्रदान की।

जीवन के अंतिम समय राजा दर्शन सिंह ने अपने परिवार को एकजुट किया और बड़े पुत्र जयलाल सिंह को समझाते हुए कहा, अंग्रेज चालाक हैं हर समय उसकी दृष्टि हमारे राज्य को हड़पने की रहती है, उसको कभी कामयाब नहीं होने देना। 70 वर्षीय राजा दर्शन सिंह 1 अप्रैल 1851 को यश:कायी हो गए।

नोट: अगले संस्करण में अवध (लखनऊ) की क्रांति में अमर शहीद राजा जयलाल सिंह की शहादत और उनके पिता का वर्णन करूंगा, इंतजार कीजिए।

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